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* वक़्त *

वक़्त ज़्यादा तो नहीं हुआ, पर इतना तो बीत ही चुका है कि अब ना तो स्कूल की छुट्टियाँ होती हैं, और ना ही अब नानी के घर जाना हो पाता है।

पर आज आई हूँ मैं फिर एक बार, बहुत वक़्त बाद। वक़्त बहुत बीत चुका है, पर इतना भी नहीं कि सब बदल गया हो। वो मोड़ जिसमें से नानी का घर साफ दिखाई पड़ता था, उस मोड़ से मुड़ते ही दिखे मुझे मेरे नाना जी, घर के बाहर मेरा इंतज़ार करते। मैंने कहा ना, वक़्त इतना भी नहीं बदला। मैं रिक्शा से उतरी और उन्हें गले मिली। कितने कमज़ोर हो गए हैं वो। दिल भर सा आता है।

कदम जैसे ही अंदर बढ़े, मानो मैं घिर गई यादों के एक बवंडर में। मुझे दिखने लगा वो वक़्त जब हम आया करते थे गर्मियों की छुट्टियों में। दिखने लगा वो वक़्त जिसमें शोर था, हंसी थी, अनगिनत बातें थीं। जब हम घर की चौखट पर बैठ कर बतियाते थे और नानी माँ हाथ में पंखा लेकर हमें हवा करती थीं। बड़ा सा गोल चश्मा उनका, याद है मुझे। वो जो आलू के परांठे पर इतना प्यार डाल कर परोसती थी हमें, भूली नहीं हूँ मैं आज भी। वो शाही टुकड़े, जिनपर नानी कटे बादाम और खोया डाल दिया करती थी। मैं आज भी माँ से कहती हूँ, आप वैसे शाही टुकड़े नहीं बना सकती।

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इससे पहले कि मैं यादों के बवंडर में डूब जाती, मैं संभल गयी और अंदर बढ़ी, सारे घर का मुआयना करने। आज भी ड्राइंग रूम में वही पेंटिंग लगी है जो माँ को उनकी सहेली ने उनकी सगाई पर गिफ्ट की थी। वो स्टोर रूम जिसमें सिरहाने और चादर रखी होती है, उसकी ख़ुशबू आज भी बिलकुल वैसी है। वो रसोई जहाँ बैठ कर मैं छोटी मासी के साथ खूब बातें किया करती थी। वो छोटी सी घुरनि जहाँ हम छुपन छुपाई खेलते वक़्त छुपा करते थे। घर का हर एक कोना वैसा ही है। हर एक कोने में अनेकों यादें छुपी हैं। वो एक छोटा सा आईना जिसमें मैं बचपन में खुद को निहारा करती थी। अब मेरा कद उस आईने से बढ़ गया है , क्या इस बात से अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि वक़्त कितना आगे बढ़ गया है?

एक दम से हर कोना शांत हो गया। वो शांत ही है अब। क्या मैं कुछ आंसू नहीं गिरा सकती?

यहाँ आने से पहले किसी ने पूछा था, कहाँ जा रही हो? ज़ुबाँ से फिसलते शब्दों को रोक कर मैंने कहा “नाना जी के घर”। दिल चीख कर यही कह रहा था “नानी के घर”। मैंने कहा ना, वक़्त बदला है, पर इतना भी नहीं।

~सृष्टि बठला

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